बेटी बरदाश नही,तो बहु क्यों चाहिए [ कविता ] ?

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अपनी कलम से मैं अपना एक दर्द लिखने जा रहा हूँ।
ना ये शायरी है,
ना ये कविता…
मैं तो बस दर्द-ऐ-ज़ख्म लिखने जा रहा हूँ।

नयी नयी हुई शादी थी घर उनके,
बहु आई थी उनके द्वार।
स्वागत हुआ ऐसे ,
जेसे लक्ष्मी आई हो उनके द्वार॥

वो बहु उस घर में घुलने-मिल्ने लगी।
उस घर का एक महत्वपूर्ण अंग बनने लगी॥
एक दिन उसने खुशखबरी अपने पति को सुनाई।
उसके पति को ये बात बहुत रास आई॥

वो दौड़ा, गया अपनी माँ के चरण में।
बोला- माँ कुछ समय बाद एक बच्चा होगा आपकी शरण में॥
माँ उत्साहित थी की कुछ ही दिनों में उसके घर किलकारी गूंजेगी।
पर उसके मन्न में एक सवाल था- लड़का है या लडकी ये बात कैसे पता चलेगी॥
माँ को ये सवाल अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
कंही बेटी न हो जाए ये डर उसे संताए जा रह था॥

वो एक दिन बेटे को पास बुलाकर बोली-
बेटा देख मुझे लड़का चाहिए किसी भी हाल में।
लड़की हुई तो उसे फ़ेंक देना मृत्यु के जाल में॥
लड़का माँ की बात सुन सकपका गया।
वो बोला- कैसी बात करती हो माँ, तुझे क्या हो गया॥
लड़का हो या लडकी ये तो इश्वर के हाथ में है।
हमे स्वीकार है जो होगा, हमारी किस्मत हमारे साथ में है॥

आया दिन खुशियों का,
उनके आँगन किलकारी गूंजी।
उनके घर फूल सी कन्या हुई,
सास बोली- अब तो दहेज़ में जाएगी सारी जमा-पूंजी॥
पल बीते,
दिन बीता।
साल बीते,
वक्त बीता ॥

सास के कान में खबर आई फिर होने वाले नन्हे मेहमान की ।
सास बोली बेटे से- या तो मुझे पोता दे वरना में शक्ल देखूंगी कब्रिस्तान की॥
माँ की बातें सुन बेटे के पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
उसकी जिंदगी अब दो-राहे पर अटक गई॥
उसने ये बात अपनी पत्नी को बताई।
पत्नी की फिर आँखें छलक आई॥
पत्नी ने किया इनकार परिक्षण से।
पति बहलाने-फुसलाने लगा,
ठीक नही लगा कुछ, उसके लक्षण से॥
पत्नी फिर झांसे में आ गई।
वो परिक्षण के लिए मान गई॥

लिंग जांच कानूनन अपराध है, ये बात पति को पता थी।
पर करानी तो है जांच ये दुविधा थी॥
पति ने फिर पता लगवाया।
एक चिकत्सक जो ये जांच करता है, किसी ने ये बतलाया॥
पति-पत्नी पहुँचे चिकित्सक के पास।
क्यूंकि वही था उनकी आखरी आस॥
चिकित्सक फिर लिंग जांच करने लगा।
अपना धर्म, कर्तव्य, कर्म, पेशा,
वो उसे बेचने लगा॥

वही हुआ जो सास को आशंका थी।
गर्भ में एक मासूम सी कन्या थी॥
बेटे ने फिर अपनी माँ को सच्चाई बताई।
पर माँ को ये बात रास ना आई॥
माँ बोली- तब तक तक घर मत आना।
पहले उसे गिराओ, फिर मुझे अपनी शक्ल दिखाना॥
सास और पति के दबाव में एक माँ आ गई।
ना जाने उस पल, उसकी ममता कंहा गई॥

चिकित्सक ने फिर अपना काम शुरू किया ।
औजारों का ज़खीरा उसने लाकर रक्ख दिया॥
फिर डाल औज़ार वो माँ के गर्भ में उसे टटोलने लगा।
मानो एक सांप अपना शिकार खोजने लगा॥
औज़ार पास आता देख वो कन्या सेहेमने लगी।
“माँ मुझे बचालो” वो ये कहकर चीख-पुकार करने लगी॥
वो औज़ार फिर उस कन्या को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटने लगा था।
उस निर्दई चिकित्सक ज़रा भी दया न आई,
मानो जेसे एक लाकडहार पेड़ काटने में लगा था॥
वो अंग काटता गया,
कन्या चीखती रही,

वो अपने पाप के कार्य में आगे बढ़ता रहा।
कन्या की साँसे उखड्ती रहीं॥
हर अंग कट चूका था, सिर्फ एक बाकी था।
आसान काम तो हो गया था,
मुश्किल अभी बाकी था॥
चिकित्सक ने फिर औज़ार बदला, क्यूंकि अब सिर बचा था।
बेरहम क़त्ल तो हो चूका था,
उसपर मात्र एक औपचारिकता की मोहर लगना बाकि था॥
हर अंग काटा गया, सिर को तोड़ा गया।
मानो अखरोट को पत्थर से फोड़ा गया॥
सिर के फिर सेकड़ो टुकड़े हो गए।

ना जाने इंसान कब और केसे इतने निर्दई हो गए॥
कसाई सा उसका व्याक्तित्व था।
उस चीर-फाड़ के बाद वो औज़ार खून से लत-पत था॥
केसे एक बाप का दिल इतना छोटा हो गया।
पैसे देकर जो वो अपनी बेटी का ही कत्ल करवा गया॥
वो घर लौटे तो सास के चेहरे पर एक चमक थी।
जेसे हत्या न करवाई हो, उसने जीती कोई जंग थी॥
ना हत्या का गम, न चेहरे पर कोई शिकन का भाव था।
उसके चेहरे पर थी तो चमक, पर उसके व्यक्तित्व में इंसानियत का अभाव था॥
मैं आज लिख नही रहा, रो रहा हूँ,

आज कलम सिहाई से नही, आंसुओं से भिगो रहा हूँ॥
मेरे कुछ सवाल है दुनिया वालों तुमसे-
अगर बेटी बरदाश नही,
तो बहु क्यों चाहिए…?
जीवन-संगिनी क्यों चाहिए..???
पत्नी की कोख में कन्या पसंद नहीं।
तो नवरात्रों में कन्या क्यों चाहिए….????
पत्नी की बेटी बरदाश नही,
तो माँ क्यों चाहिए…..???

एक माँ के अंग को तुम नष्ट कर देते हो।
तो अर्धांगिनी क्यों चाहिए…..???तुम्हे बेटी पसंद नही,
तो अपने लड़के के लिए बहु क्यों चाहिए….???
तुम्हारे वंश को आगे बढ़ने वाली,
उस वंशज को जन्म देने वाली माँ क्यों चाहिए…????
मेरे सवाल लाज़मी समझो तो मेरी बात पर गौर करना।
वरना इस सृष्टि के अंत की प्रतीक्षा करना॥

4 COMMENTS

  1. बहुत ही रोचक कविता आपने साझा किये हैं। बहुत ही दुःख की बात है लोग बेटी नही चाहते हैं लेकिन, बहु चाहते हैं उन्हें ये सोचने चाहिए कि बेटी नही तो बहु नही होगा। हमारे विचार से लोग बेटी पैदा होने पर इसलिए उनसे नफरत करते हैं क्योंकि दहेज देना पड़ता है। यह बहुत ही कुष्ठ और घटिया रिवाज है दहेज लेना । हमारे समाज मे बहुत से ऐसे लोग हैं जो गरीब तबके के लोग हैं जो अपनी बेटी के विवाह में दहेज देने में असमर्थ हैं । में दाबी के साथ कहता हूँ अगर जिस दिन दहेज बन्द हो जाएगा उस दिन 75% लोग बेटी पैदा करने से नही घबराएगा।
    दहेज को सरकार बन्द नही कर सकेगी जब तक हम खुद बन्द न करेंगे ।
    हमे ये सोचना नही चाहिये कि वो दहेज ले रहा है तो मैं भी लूंगा बल्कि आपको ये सोचना चाहिए कि में दहेज नही लूंगा । 18 वर्ष जिसने उस लड़की को
    पाल- पोसकर बड़ा किया और उस फूल जैसी कन्या को हमे सौंप रहा है। क्या में इनके बदले पैसे लूं । लालच हैं इन गंदे लोगों पर..इन लोगों को मर जानी चाहिए। अगर आप दहेज लेना छोड़ देंगे तो आपको देखकर लोग जागरूक होगा और वह भी दहेज लेना छोड़ देगा। इसलिए संकल्प लो दहेज कभी नही लेंगे ।

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